Skin: सब की त्वचा का रंग अलग-अलग क्यों होता है

भले ही इंसान दुनिया में कहीं भी पैदा हो उसका दिमाग गुलाबी रंग का, खून लाल रंग का, और हड्डियां सफेद रंग की होती हैं।

मगर हमारी त्वचा का रंग अलग-अलग होता है। हमारे चेहरे भी अलग-अलग दिखते हैं। अब ऐसा क्यों हैं। इसका उत्तर जानना एक पहेली हल करने जैसा है।

जब सारे हिस्से अपनी अपनी जगह फिट हो जाते हैं तो हमें उत्तर मिल जाता है। चलिए देखते है हम केवल त्वचा के रंग की बात करेंगे।

हम जानते हैं कि किसी वस्तु का रंग वही होता है जिस रंग का प्रकाश व परावर्तित करती है।

अगर तुम्हारी त्वचा गहरे रंग की है तो इसका मतलब है कि वह ज्यादातर रंगों को सोख रही है और अगर तुम्हारी त्वचा हल्के रंग की है तो इसका मतलब है कि वह ज्यादातर रंगों को परावर्तित कर रही है।

मेलेनिन

मगर त्वचा में ऐसा क्या होता है जो ये करता है। इसकी वजह है मेलानिन नाम का पदार्थ जो त्वचा में पाया जाता है।

मेलेनिन दो प्रकार का होता है।

1.हल्के रंग का

2.गहरे रंग का

आपकी त्वचा का रंग उसमें मौजूद मेलेनिन के रंग और मात्रा पर निर्भर करता है।

मगर हमारी त्वचा में मेलेनिन होता ही क्यों है इसकी जरूरत क्या है

मेलेनिन के कार्य

हमारी त्वचा को सूरज से निकलने वाली ऊर्जा में मौजूद कुछ हानिकारक किरणों से बचाने के लिए मेलेनिन जरूरी है।

तुम जानते हो कि सफेद प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना होता है।

मगर सूर्य से आने वाले प्रकाश में इन रंगों के अलावा अन्य किरणें भी होती हैं जिन्हें हम देख नहीं पाते। उनमें से एक है अल्ट्रा वायलेट यानी पराबैंगनी किरणें।

ये किरणें हमारी त्वचा को नुकसान पहुंचा सकती हैं। मेलानिन इन खतरनाक किरणों को सोख कर त्वचा की रक्षा करता है। इसलिए हमारी त्वचा अपनी रक्षा के लिए मेलेनिन बनाती है।

त्वचा का रंग अलग-अलग क्यों होता है?

लोगों की त्वचा का रंग अलग-अलग इसलिए होता है क्योंकि उनकी त्वचा में मेलेनिन की मात्रा और रंग अलग-अलग होते हैं।

मगर अलग अलग लोगों की त्वचा में मेलेनिन का रंग और मात्रा अलग अलग क्यों होती है।

हमने जाना कि पराबैंगनी किरणें त्वचा के लिए हानिकारक होती हैं। पर इन्ही पराबैंगनी किरणों की वजह से हमारी त्वचा जरूरी विटामिन डी बनाती है।

अब अच्छी सेहत के लिए हमें पराबैंगनी किरणों की जरूरत है इसलिए एक ओर तो त्वचा को अधिक पराबैंगनी किरणों से बचाना जरूरी है।

वहीं दूसरी ओर विटामिन डी बनाने के लिए इनका थोड़ी मात्रा में हमारी त्वचा में घुसना भी जरूरी है।

पृथ्वी पर कुछ जगहों पर यह पराबैंगनी किरणें ज्यादा मात्रा में पड़ती हैं तो कुछ जगहों पर कम मात्रा में और यह मात्रा मौसम के अनुसार बदलती भी रहती हैं।

नक्शे मे देखने के बाद पता चलता है  कि पृथ्वी के मध्य भाग में ज्यादा तीव्र पराबैंगनी किरणें पड़ती हैं। और ध्रुवों की तरफ जाने पर यह कम होती जाती है।

यानि हम कह सकते हैं कि जहां पराबैंगनी किरणें ज्यादा है वहां त्वचा की रक्षा के लिए मेलेनिन ज्यादा और गहरे रंग का होना चाहिए और जहां पराबैंगनी किरणें कम है।

वहां मेलानिन कम और हल्के रंग का लेकिन पृथ्वी के अलग अलग हिस्सों पर रहने वाले इन्सान हमेशा से वहां नहीं रहते थे। हम इंसानों के सबसे पहले पूर्वज अफ्रीका में विकसित हुए। यहां से वो दुनिया के हर हिस्से में फैले।

पूर्व,पश्चिम, उत्तर और दक्षिण जैसे जैसे वो पृथ्वी के अलग अलग जगहों पर बसे उन्हें कम या ज्यादा मात्रा में पराबैंगनी किरणें मिलीं।

इसलिए ऐसा लगता है कि जैसे जैसे इंसान दुनिया के अलग अलग हिस्सों में विकसित हुए भूमध्य रेखा के नजदीक रहने वाले इंसानों में मेलेनिन का रंग गहरा हो गया और उसकी मात्रा ज्यादा हो गई जिससे उनकी त्वचा गहरे रंग की हो गई।

भूमध्य रेखा से दूर रहने वाले इंसानों में मेलेनिन हल्का और कम हो गया जिससे सूरज की ज्यादा रोशनी त्वचा में घुसकर विटामिन डी बनाने में मदद कर सकती थी।

लेकिन ये सब होने में हजारों साल लगे मगर आज भी हम लोग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आसानी से चले जाते हैं और तुम देख सकते हो कि एक ही जगह में अलग अलग रंगों की त्वचा वाले लोग रहते हैं।

उनकी त्वचा का रंग पूरी तरह से नहीं बदला है। अब ऐसा क्यों। हम जिस तरह से बने हुए हैं हम जैसा दिखते हैं और हमारे अनेको शारीरिक गुण डीएनए नाम के पदार्थ द्वारा निर्धारित किये जाते हैं।

जो हमारे शरीर में हर जगह मौजूद होता है। बच्चों में डीएनए माता पिता से आता है माता पिता को उनका

डीएनए उनके माता पिता से मिला और ऐसी ही कड़ी बनती जाती है।

इस डीएनए से यह निर्धारित होता है कि तुम्हारी त्वचा में कौन सा मेलेनिन कितनी मात्रा में बनेगा। यदि ने बदल तो सकता है लेकिन ऐसा होने में बहुत सारी पीढ़ियों का समय लगता है।

आज से एक हजार साल पहले सिंधी समुदाय के लोग पूर्वी अफ्रीका से भारत आये। इतिहास में जहाज के संबंध में इनका नाम जुड़ा हुआ मिलता है।

वो गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में रहते हैं। अब भारतीय हैं लेकिन उनकी त्वचा के रंग और चेहरे की बनावट के कारण वो अभी भी अपने अफ्रीकी पूर्वजों जैसे ही दिखते हैं।

इतने कम समय में उनका डीएनए नहीं बदला है।

डीएनए में मेलेनिन में और पराबैंगनी किरणों में हमारी त्वचा का रंग हजारों सालों से विकसित हुआ है। त्वचा के रंग से यह निर्धारित नहीं होता कि कोई इंसान दूसरे से बेहतर है। विज्ञान हमें यह समझ लेता है कि अलग अलग रंगों की त्वचा के नीचे हम सब एक ही हैं इंसान और हम सभी को अपना जीवन बेहतर बनाने के लिए दूसरों के बराबर अवसर पाने का अधिकार है।

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